Friday, 30 June 2017

चीन की धमकी और हमारे दु:खस्वप्न !!

खबर है कि चीन हमें धमका रहा है. पार्ट टाइम रक्षा मंत्री कह रहे हैं डरने की बात नहीं है. भारत 1962 से बहुत आगे निकल चुका है. कुछ विद्वान रक्षा विशेषज्ञ बता रहे हैं कि चीन के सामने भारत की औकात नहीं के बराबर है, इसलिए पंगे में न पड़े.
चीन भी यह बात जानता है कि पाकिस्तान जिसको नंगा कर देता है, उसकी औकात क्या होगी! चीन क्या पूरी दुनिया जानती है कि भारत सबसे दोस्ती चाहता है, किसी से पंगा लेनेवाला देश नहीं है. हम राष्ट्रवादी लोग इसे अपना गुण मानते हैं कि हम मानवतावादी और सहिष्णु हैं. लेकिन दुनिया के बाकी देश भी ऐसा मानते हैं?
हमने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया. किसी की संप्रभुता को जीतने के बजाय हमने दिलों को जीता है ! यही कारण है कि हमारे महात्मा गांधी की मूर्तियाँ दुनिया में सबसे ज्यादा लगी हैं. गांधी के जन्मदिन को दुनिया ने अहिंसा दिवस के रूप में मनाना शुरू किया. यानी दुनिया को अहिंसा की जरूरत सबसे ज्यादा है. हिंसक देश भी मानते है कि अहिंसा मनुष्य का पहला धर्म है.
चीन तो बुद्ध को माननेवाला देश है, लेकिन वहीं के महान नेता ने कहा है कि सत्ता बन्दूक की गोली से निकलती है. इसलिए बुद्धिज़्म को अपना धर्मं मानने के बावजूद चीन बंदूकों में हमसे आगे है. 62 के युद्ध में हमको बुरी तरह हरा चुका है,इसलिए भी उसका मनोबल ऊंचा है. एक और गुण भी है उसके पास, एक नंबर का धोखेबाज है. हमारे संस्कारों में युद्ध भी नीति अनीति से लड़ने की सीख है. जबकि दुनिया कहती है लव एंड वार में सबकुछ जायज है.
भारत की अगर वाकई कोई औकात नहीं है, तो हमारे नेता क्यों लाल किले से झूठे भाषण देते रहते हैं ? अपनी सामरिक क्षमता का क्यों और किसके लिए प्रदर्शन करते रहते हैं ?
युद्ध हो ये अच्छी बात नहीं, लेकिन युद्ध से भागना उससे भी बुरी बात है. नेहरू चीन से हार गये, लेकिन  इसके बाद भारत ने दो बार पाकिस्तान को भारी शिकस्त दी. इन्दिरा गाँधी ने बाग्लादेश बना दिया और दुनिया देखती रह गई!  
कूटनीतिक स्तर पर हमारी स्थिति तब भी बेहद मजबूत थी, जब दुनिया दो धड़ों में बँटी थी और युद्ध निर्णायक लग रहा था. नेहरू दुनिया को युद्ध के परे रास्ता दिखाने में कामयाब हो गये थे. इन्दिरा गाँधी ने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ और देश के सामरिक बल से बाहुबली अमेरिका को भी पट्टी पढ़ा दी थी. फिर आज हालात इतने बुरे क्यों हैं देश के? किसी की धमकी भर से हम क्यों काँपने लगते हैं ? बचने का रास्ता ढूँढने लगते हैं ? क्या चीन में इतनी शक्ति है कि वह हमें बरबाद कर देगा ? क्या चीन युद्ध का बोझ बर्दाश्त करने की स्थिति में है. क्या उसे अपनी बरबादी का डर नहीं है ?
हमारे यहाँ कहावत है बनिया लड़ाई नहीं चाहता, क्योंकि वह जानता है कि लड़ाई में उलझेगा तो व्यापार चौपट हो जायेगा. दुनिया जैसे जैसे आगे बढ़ रही है, अर्थ और बाजार तरक्की के सबसे जरूरी घटक होते जा रहे हैं. चीन इस बाजारवाद में अमेरिका को पछाड़ने में लगा है. और इस बाजारवाद में बेहद अहम हो जाता है उपभोक्ता. भारत चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है. कुछ सालों बाद बाजार के मामले में हम चीन से भी आगे चले जाने वाले हैं. ऐसे में हमारा रोल और भी बड़ा हो जायेगा. फिर भी हम डरते हैं. क्या डरकर जिया जा सकता है ?
डरकर जीने वाले कायर कहलाते हैं. क्या भारत कायरों का देश है ? क्या हमारी बहादुरी सिर्फ अपने ही देश के गरीबों और कमजोरों को मारने तक सीमित है?
सत्ता व्यापारियों की इशारे पर चलती है, इसके उदाहरण हम पूरी दुनिया में देख रहे हैं. हथियारों का बाजार लगातार बढ़ रहा है. दुनिया को युद्ध की भूमि में धकेल कर हथियारों के व्यापारी फल फूल रहे हैं. और वह चाहते हैं कि यह स्थिति बनी रहे, लेकिन बाकी व्यापारी? क्या टीवी, कम्प्यूटर और मोबाइल के व्यापारी भी ऐसा ही चाहते हैं ?
आधुनिक दुनिया पैसों और सुविधाओं के कांधे पर सवार है. फिर हथियारों के व्यापारी ज्यादा ताकतवर क्यों हैं? क्यों भय के खेल में हमारे नेता और चिंतक फँस जाते हैं? देश के बहादुरों को क्यों नहीं सरहद पर भेजते. गाय बचाने से ज्यादा जरूरी है देश को बचाना ! फिर चीन की चुनौती स्वीकार करने से हमारे बहादुर देशभक्त क्यों डरते हैं?
Dhananjay Kumar       


Tuesday, 22 November 2016

नोटबंदी के पीछे का सच !


जाहिरा तौर पर सरकार जरूर यह बता रही है कि नोटबंदी देश के काले धन को समाप्त करने के लिए उठाया गया कदम है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकार एक तीर से तीन शिकार कर रही है. पहला, काले धन का मुद्दा तात्कालिक तौर पर सुलझता नजर आ रहा है, दूसरी तरफ विरोधी पार्टियों और नेताओं को गहरा आर्थिक झटका लगा है और तीसरे, देश के एक एक आदमी के घरों और तिजोरियों में रखा सफेद धन बैंकों में जमा हो रहा है. इस वजह से बैंकों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और बैंक कॉर्पोरेट कम्पनियों के नये प्रस्तावों पर लोन पास करने में सक्षम होंगे. सरकार का असली लक्ष्य यही है. जैसा कि जाने अनजाने वित्तमंत्री ने अपनी पार्टी के नेताओं को संबोधित करते हुए कहा भी है. 
भारत में आर्थिक उदारीकरण को पंख लगाने का काम मनमोहन सिंह ने किया. भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर से लेकर प्रधानमंत्री तक उन्होंने कॉर्पोरेट कम्पनियों को सबसे लायक बेटे के तौर पर आगे बढ़ाया. उन्हें बैंक आसानी से लोन दे सके, इसके लिए बैंकों की लोन पॉलिसी को सरल बनाया ताकि कॉर्पोरेट कम्पनियों अपने कारोबार का अधिक से अधिक विस्तार करे और देश में व्यापार और रोजगार को गति मिले. देश की अर्थव्यवस्था को गति मिले. आर्थिक सुधारों के दम पर ही मनमोहन सिंह राजनीतिक व्यक्ति नहीं होते हुए भी दस वर्षों तक भारत के प्रधानमंत्री बने रहे. इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था में अप्रत्याशित उछाल आया, लेकिन दूसरी तरफ यह भी हुआ कि देश के बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता गया और हालात यहाँ तक आ पहुँचे कि देश के सारे बैंक घाटे में चलने लगे.
आम आदमी के लिए आज भी बैंकों से लोन लेना बेहद मुश्किल भरा टास्क है. आप घर, गाड़ी या किसी बिजनेस के लिए लोन लेना चाहते हैं, तो आपको भारी पेपरवर्क करना होता है. और अगर लोन चुकाने में आप डिफॉल्टर साबित होते हैं तो बैंक आपके घर गाड़ी पर कब्जा लेने से भी बाज नहीं आती. लेकिन कॉर्पोरेट कम्पनियों के साथ ऎसा व्यवहार नहीं किया जाता, क्योंकि मौजूदा आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि देश के औद्योगिक विकास के लिए कॉर्पोरेट कम्पनियों को विशेष सुविधाएँ देना जरूरी है, ताकि उनको अपना कारोबार पसारने में किसी तरह की दिक्कत न हो.
इसके लिए भारत सरकार ने 2013 में नया कंपनी कानून बनाया. इस कानून के मुताबिक नई कंपनी शुरू करने के लिए लोन मिलने में एक या दो दिन से अधिक समय नहीं लगना चाहिए। पहले यह समय सीमा नौ-दस दिनों की हुआ करती थी. बैंकों पर लोन देने के लिए सरकारी दबाव भी बढ़ने लगा. दबाव का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि पिछले वित्तवर्ष में सड़सठ कंपनियों के ऊपर बैंकों का कुल 5.65 लाख करोड़ रुपए कर्ज था.
कॉरपोरेट्स से उम्मीद की जाती है कि वे आर्थिक सुधार की बुनियाद तैयार करेंगे, लेकिन विडम्बना यह रही कि देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए मेहमान की तरह पाली पोसी गयी कई कॉर्पोरेट कम्पनियाँ स्वयं बैंक कर्ज में गहरे डूब गई हैं और कुछ डूबने के कगार पर हैं. सिर्फ 30 बड़ी कम्पनियों के पास बैंकों के सवा लाख करोड़ रुपए एनपीए के तौर पर हैं. ज्यादातर कॉर्पोरेट कम्पनियों ने बाजार पर अधिक से अधिक कब्जा जमाने के लिए अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा विस्तार कर लिया है. ऎसे में यदि बैंकों से उसे समय पर लोन नहीं मिलते हैं तो उनके प्रोजेक्ट अधूरे रह जायेंगे और विकास की गति तथा रोजगार बढ़ने की संभावनाओं पर न सिर्फ विराम लग जायेगा, बल्कि मिले रोजगार पर भी आफत आ जायेगी.  ऎसे में सरकार भी चाहती है कि बैंक इन कम्पनियों को और लोन दे, जबकि बैंक और लोन देने की स्थिति में नहीं हैं.
अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि अगर मौजूदा माहौल में सुधार नहीं होता है तो उद्योग जगत के लिए पूंजी जुटाना मुश्किल हो जाएगा. ऐसी स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था को ठीक ठाक रखना सरकार के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो जायेगा. यही वजह है कि सरकार राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए सारे क्षेत्रों में सबसिडी को कम कर रही है. और साथ ही काले धन की बरामदगी को लेकर एक बड़ा रिस्क लेने को मजबूर हुई.
नोटबंदी की वजह से देश में कितनी अफरा तफरी मची है इसका आकलन सरकार के पास भी है. उसे मालूम कि इसकी वजह से आम आदमी को जो परेशानी उठानी पड़ी है, उसका खामियाजा अगले चुनावों में उसकी पार्टी को उठाना पड़ सकता है. दूसरे, नोटबंदी से बाजार पर जो असर पड़ रहा है या पड़ेगा इसका आकलन भी सरकार के पास जरूर होगा, लेकिन मुश्किल यह है कि मौजूदा सरकार के सामने पूँजी जमा करने का और कोई विकल्प नहीं था. पिछली सरकारें भारतीय अर्थशास्त्र को इस तरह निबटा चुकी है कि मौजूदा सरकार के सामने कॉर्पोरेट कम्पनियों की अगवानी करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.
धनंजय कुमार 

Friday, 9 September 2016

शिक्षा, न्याय और व्यवसाय : समाज और देश के जरूरी आधार हैं.

शिक्षा, न्याय और व्यवसाय किसी भी समाज के विकास के जरूरी तत्व हैं. इन तीनों में से किसी एक का भी चरित्र बिगड़ा तो तय मानिए समाज पतन की तरफ मुड़ चुका है. और चरित्र बना रहे इसके लिए जरूरी है कि इन तीनों के बीच परस्पर मीठे संबंध बने रहेंं !
भारतीय संदर्भ में, इन तीनों के अंतरसंबंधों पर विमर्श करना बेहद जरूरी, प्रासंगिक और समसामयिक हो गया है, क्योंकि आजादी के बाद राजनीति और शासन के तमाम विचारों के प्रयोग के बावजूद हम देख रहे हैं कि हमारा समाज निरंतर पतन की ओर अग्रसर है. युवकों में या तो हताशा है या अमीर और साध सम्पन्न बनने की ललक. इसके लिए वह किसी भी रास्ते से गुजरने को तैयार हैं. वो रास्ता चाहे भ्रष्ट और अमानवीय की क्यों न हो! और यह उस देश का दुर्भाग्य है, जिस देश के युवा में संवेदनशीलता, सामूहिकता और सामाजिकता की राह छोड़ केवल स्वयं आगे बढ़ने की राह पर चल पड़े. स्वयं को आगे देखने की संकल्पना अच्छी है, लेकिन येनकेन प्रकारेण आखिरकार गर्त की तरफ ही ले जाती है. और जब युवा ही पतनशील हो जायेंगे, तो फिर समाज और देश को कौन सही राह ले जायेगा? परिणाम है आजादी के पश्चात श्रेष्ठ शासन व्यवस्था यानी लोकतंत्र को अपनाने के बावजूद हमारा देश और समाज समता मूलक, न्यायपरक और विकासशील होने के बजाय विषमता और अन्याय के चक्रव्यूह में फँसता जा रहा है. राजनीति के सारे आयाम हमने आजमा लिए मध्यमार्ग, समाजवाद, वामपंथ और दक्षिणपंथ भी. लेकिन हम देख रहे हैं कि 70 साल के बाद भी आम आदमी को समुचित रोटी, शिक्षा और न्याय नहीं दे पाये हैं. उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद आर्थिक और सामाजिक विषमताएँ और बढ़ी हैं. देश की 70 प्रतिशत आबादी अब भी जिन गाँवों में रहती हैं, वहाँ का मूलभूत मानवीय ढाँचा भी दयनीय है. हर आदमी रोटी रोजगार के लिए भी शहर भागा चला आ रहा है. और नतीजा है कि शहरों की व्यवस्था भी चरमरा गई है.
ऎसा क्यों हो रहा है..? कहाँ चूक हो रही है हमसे. बहुत चिंतन के बाद हमने "हमारे गाँव" की संकल्पना की. हमारे गाँव की संकल्पना इसलिए कि हमारा देश आज भी गाँवों का देश है. हमारी सारी संस्कृतियाँ, परम्पराएँ, रीति रिवाज और जीवनशैली गाँव परक है. इसलिए हमारे समाज और देश का विकास बिना गाँव के संभव नहीं है.
महात्मा गाँधी भी यही चाहते थे, देश का विकास गाँव के रास्ते ही हो. शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के रास्ते विकास की राह पर देश को चलाने की परिणति हम देख चुके. देश में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ती जा रही है. देश के अधिकांश संसाधन पर कुछ मुट्ठी पर उद्योगपतियों ने कब्जा जमा रखा है. विडम्बना यह है कि देश के बाकी लोगों की नजर भी उसी राह चलकर अमीर बनने की है. इसलिए हर जगह अफरा तफरी मची है. न्याय और न्याय की बात हाशिये पर चली गई है. मुख्य दौड़ सम्पत्ति बढ़ाने के लिए है. येनकेन प्रकारेण. नतीजा है, हर तरफ अराजकता भरा माहौल है. शिक्षा से लेकर न्याय तक महँगा होता जा रहा है ; इतना महँगा कि आम आदमी की पकड़ से हर जरूरी मानवीय चीज दूर होती जा रही है. ऎसे में यह जरूरी है कि हम अपनी दिशा और दशा पर विचार करें, चिंतन करें.
“हमारे गाँव” की संकल्पना उसी चिंतन से निकली है. इस संकल्पना में गाँव हमारी व्यवस्था का द्वार है. गाँव को अगर हम साफ सुथरा कर दें, व्यवस्था में गाँव के आम आदमी को भागीदार बना दें, तो हमारी बहुत सारी परेशानियाँ स्वतः खत्म हो जायेंगी. हमें नेता की नहीं सहभागियों की जरूरत है, जो जीवन की हर प्रक्रियाओं में साथ चले, सुख-दुख साथ भोगे और साथ विचार करे कि अच्छा क्या है और बुरा क्या..?
ग्राम पंचायत की संकल्पना इसी की कड़ी थी. गाँधीजी ने इस कड़ी के महत्व को समझा था, इसीलिए उन्होंने ग्राम पंचायती व्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया था. लेकिन दुनिया के साथ स्पर्द्धा की महत्वाकांक्षा में हमारे नेता उलझते चले गये और हमारी व्यवस्था आज इस हाल में पहुँच गई है कि आम आदमी की पकड़ में न शिक्षा रही, न न्यायव्यवस्था और न ही विकास की खुशी. दसवीं तक की शिक्षा के लिए बच्चों को पाँच पाँच दस किलोमीटर चलना पड़ता है. बरसात,जाड़े और गर्मियों के विशेष कुछ महीनों में कितनी दिक्कत होती है यह किसी से छुपी नहीं. हालाँकि इन सत्तर सालों के सफर में हर गाँव में प्राथमिक विद्यालय तो सरकार ने खुलवा दिए हैं, लेकिन उनकी हालत दयनीय है. मिड डे मील, पोशाक और पुस्तकों के नाम पर शिक्षकों के स्तर पर समझौता किया गया और नतीजा है कि बच्चों को स्कूल जाने के बाद भी मतलब भर शिक्षा नहीं मिल पा रही है.
कॉलेज की शिक्षा के लिए विद्यार्थियों को और भी तकलीफें उठानी पड़ती हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में डिग्री कॉलेज की शिक्षा के लिए भी कम से कम जिला मुख्यालय का मुँह देखना पड़ता है. गाँव से 20 से 30 किलोमीटर दूर जाकर जिला मुख्यालय में रहना और पढ़ाई करना गरीब परिवारों के लिए किसी जंग से कम नहीं है. लड़कियों के मामले में तो समस्याएँ और भी गहरी हो जाती हैं. नतीजा यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति आज भी बेहद दयनीय है. हमारे गाँव की संकल्पना में डिग्री कॉलेज तक की शिक्षा देने के लिए ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोलने विमर्श है. आमतौर पर ब्लॉक आसपास के पाँच सात किलोमीटर की परिधि में बसे गाँवों का केन्द्र होता है. इससे लड़कियों को भी डिग्री स्तर तक की शिक्षा आसानी से मिल सकेगी.
दूसरा तत्व है न्याय. न्याय के लिए ग्रामीणों को जिला मुख्यालय स्थित अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जो कि आवागमन के साथ साथ बाकी मामलों में भी बेहद खर्चीला पड़ता है. पूरे जिले के लोग न्याय के लिए जिला मुख्यालय आते हैं, इसलिए वहाँ भीड़ भी बहुत ज्यादा हो जाती है. इसकी जगह “हमारे गाँव” में अदालत को भी ब्लॉक स्तर पर लाने का विमर्श है. ब्लॉक स्तर पर लोगों का आना जाना आसान होगा और जिला मुख्यालय में भीड़ भी कम होगी. जिला और सत्र न्यायालयों पर बोझ भी कम होगा. साथ ही, ग्राम पंचायतों को एक्टिव करने और उसे वैधानिक मान्यता देने की जरूरत है. हर छोटे मोटे मामले के लिए कोर्ट आ धमकना भी भीड़ बढ़ाता है. इनमें से ढेर सारे मामले पंचायतों में निबटाये जा सकते हैं. पंचायत में खर्च भी नहीं के बराबर आयेगा और न्याय भी ज्यादा सही होगा. 
और तीसरा और आखिरी तत्व है विकास. यह सही है कि बिना औद्योगिकीकरण के देश का विकास संभव नहीं है, लेकिन उसका पहला केन्द्र ब्लॉक होना चाहिए. हमारा देश चूँकि कृषिप्रधान देश है इसलिए हर ब्लॉक में फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाये जाने की जरूरत है. और इस इंडस्ट्री में सरकार और किसानों की पार्टनरशिप हो. ताकि बिजनेस का लाभ किसानों को भी मिले. इससे किसानों की आर्थिक स्थिति संभलेगी. बाकी लोगों को भी रोजगार मिलेगा. और उपभोक्ता को भी सस्ता और अच्छा सामान मिलेगा.
इस तरह भारतीय संदर्भ में “हमारे गाँव” की अवधारणा विकास की राह में गाँव को पहला और सबसे बड़ा सहभागी मानती है.
धनंजय कुमार   
        


Thursday, 17 September 2015

सिर्फ दिल बहलाव है हिंदी दिवस

हिंदी के नाम पर 14 सितंबर को हर साल प्रायोजित सरकारी और गैर सरकारी विलाप होता है, लेकिन हिंदी निरंतर खतरे के निशान की तरफ बढ़ती जा रही है. और विडम्बना यह है कि इसे रोकने के लिए न तो निरीह हिंदी भाषी जनता कुछ कर पा रही है और न ही हमारी शक्तिशाली भारत सरकार. दोनों मजबूर हैं ! और हिंदी बहादुरी के साथ वीरगति के पथ पर अग्रसर है!
देश के रोजगार की भाषा हिंदी नहीं है, इसलिए हमारे बच्चों की शिक्षा का माध्यम भी हिंदी  नहीं है. अपने समाज और देश में सम्मान पाने की भाषा हिंदी नहीं है, इसलिए आपसी बोलचाल की भाषा भी हिंदी नहीं है. देश के सारे समझदार लोग या तो अंग्रेजी में बोलते हैं या रोमन हिंग्लिश में. फिर कैसे बचेगी हिंदी ? बहरहाल, हिंदी के नाम पर सरकारी गैर सरकारी ढोंग का कोई मतलब नहीं. हिंदी अब हमारी अस्मिता की भाषा नहीं रही, इसलिए उसके निरंतर ह्रास से भी हमें कोई परेशानी नहीं होती. हम उसके क्षय के मौन दर्शक बने हैं. और बस दिल बहलाने के लिए हम हर साल 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मना लेते है. आम तौर पर, किसी को याद करने की परम्परा उसके नहीं होने के बाद निभाई जाती है, लेकिन हिंदी के होते ही यह परम्परा हम निभा रहे हैं ! क्या यह अपनी भाषा के प्रति हमारा उत्कट प्रेम और अद्भुत सम्मान है ?!
हिंदी की गति ऎसी क्यों हुई, इसके कारणों पर किसी शोध की आवश्यकता नहीं है. इसके कारण हम सबको अच्छी तरह पता हैं. स्वतंत्रता के 68 साल बाद भी हिंदी को हम अपने भारत की राष्ट्रभाषा नहीं बना पाये हैं. यह अपने आप में दिलचस्प है कि भारत दुनिया का संभवतः एक मात्र ऎसा देश है, जिसकी कोई अपनी आधिकारिक राष्ट्रभाषा नहीं है. देश का संविधान लागू होने से पहले राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हार्दिक इच्छा थी कि हिंदी को भारतवर्ष की राष्ट्रभाषा घोषित किया जाय, लेकिन कुछ गैर हिंदी प्रदेशों के राजनीतिज्ञों ने इसे अपनी क्षेत्रीय अस्मिता के भाषाई और सांस्कृतिक अस्तित्व से जोड़ लिया और हिंदी को राष्ट्रभाषा के बजाय देश की राजभाषा के तौर पर अंग्रेजी के बाद का दूसरा स्थान मिला. इसमें भी विडम्बना (हालाँकि मैं इसे षडयंत्र मानता हूँ) यह रही कि पूरे देश तो छोड़िये, हिंदी प्रदेशों में भी सरकारी कार्यालयों के कामकाज की मूल भाषा अंग्रेजी ही बनी रही. हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए हिंदी विभाग अवश्य खोले गए, लेकिन यह काम हिंदी अधिकारियों के भरोसे छोड़ दिया गया. और हिंदी अधिकारी महज अनुवादक की भूमिका निभाते रहे. वह अनुवाद भी इतना तकनीकी और बनावटी रहा कि आम हिंदी भाषियों के लिए भी सरकारी हिंदी समझना दुरुह था. परिणाम हुआ आम हिंदी भाषियों ने भी अपनी जरूरत के समय हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी को ही अपनाना सरल समझा. इस तरह हिंदी आगे बढ़कर भी पिछड़ती गई. हिंदी अनपढ़ों या कम पढ़े लिखों की भाषा भी न बन सकी. लोगों ने अपना काम तो किसी तरह चलाया, लेकिन देश में अच्छी नौकरियाँ पाने का आधार अंग्रेजी शिक्षा ही बनी रही, इसलिए हिंदी भाषियों को भी अपने बच्चों का भविष्य अंग्रेजी में ही दिखा. उदारीकरण के बाद नौकरियाँ पाने में अंग्रेजी की भूमिका और भी बड़ी हो गई. हिंदी  भाषियों ने भी अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाने के बजाय अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ाना आवश्यक समझा. नतीजा हुआ कि बच्चों की शिक्षा का माध्यम भी हिंदी की जगह अंग्रेजी बन गई.
देश भर में (खासकर गैर हिंदी भाषी प्रदेशों में) हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सरकारी स्तर पर कुछ संस्थान खोले गये, लेकिन उनका काम भी रस्मी ही रहा. क्योंकि जब आम आदमी को अपने दैनिक जीवन में हिंदी की आवश्यकता ही नहीं, तो फिर वह हिंदी समझने और सीखने पर अपना समय क्यों नष्ट करें!
हिंदी के प्रचार प्रसार में इन संस्थानों से ज्यादा योगदान हिंदी फिल्मों माना जाता रहा है और यह सच भी है. जहाँ लोग हिंदी नहीं जानते, वहाँ भी हिंदी फिल्में देखी जाती रही हैं. दूरसंचार क्रांति और उदारीकरण से पहले भी राजकपूर की फिल्में और उनके गाने विदेशों में लोकप्रिय थे. टीवी कार्यक्रमों में प्रायः रशियन और चाइनीज हिंदी गाने गाते दिख जाया करते थे. लेकिन अब फिल्मों की भाषा भी तेजी से बदल रही है. उदारीकरण के बाद फिल्मों को भी दुनिया का बड़ा बाजार मिला, परिणाम हुआ फिल्मों के संवाद और गाने हिंदी में लिखे जाने के बजाय हिंग्लिश में लिखे जाने लगे. टीवी सीरियलों में भी बोलचाल की हिंदी यानी हिग्लिश लिखने पर जोर दिया जा रहा है. इससे हिंदी विभाग में अंधेरा बढ़ने का खतरा बढ़ता जा रहा है.
हालाँकि देश में अभी भी कई ऎसे हिंदी प्रेमी हैं, जो मानते हैं कि हिंदी का भविष्य अंधकारमय नहीं, बल्कि संभावनाओं से भरा है, इसलिए एक दिन हिंदी खत्म हो जायेगी, इस बात की कल्पना करके छाती पीटने और निराशावादी होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन सच क्या है...? सच यह है कि वह भी अपने दैनिक जीवन में हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी बोलते हैं या जरूरत पड़ने पर हिंग्लिश बोलते हैं. ऎसे कथित हिंदी प्रेमी (मैं इन्हें कथित ही मानता हूँ) प्रायः यह बोलते पाए जाते हैं कि हिंदी को सरल रहने दीजिए, शुद्धतावादी मत बनिए. शुद्ध हिंदी के चक्कर में उसे किताबी या महाभारतकालीन हिंदी मत बनाइए. क्या अंग्रेजी के संदर्भ में कोई ऎसा बोलता दिखता है..?! वहाँ तो आप जितने ही कठिन शब्द या वाक्य विन्यास का प्रयोग करें, आप उतने ही बौद्धिक कहलायेंगे, लेकिन अच्छी हिंदी बोलने या लिखनेवाला महभारतकालीन हो जाता है, हँसी का पात्र बन जाता है. क्यों? इसका संबध सिर्फ और सिर्फ  हमारे आत्मगौरव और हिंदी के प्रति प्रेम से है. जो बाहरी तौर पर हिंदी दिवस या हिंदी पखवारा के अवसर पर दिखता तो है, लेकिन बाकी दिनों में विलुप्त हो जाता है. विडम्बना तो यह है कि इन्हीं में से कुछ लोगों ने यह माँग भी करनी शुरू कर दी है कि हिंदी को देवनागरी में लिखने के बजाय रोमन में लिखा जाय. मुझे लगता है यह सब हिंदी को बचाने के बजाय निपटाने का प्रयास है. ऎसे हिंदी प्रेमी (इन्हें सेलिब्रिटी कहना ज्यादा सही है) प्रायः हिंदी दिवस और हिंदी भाषा पर चर्चा के दौरान मंचों और टीवी कार्यक्रमों में पुरोहित के तौर पर प्रकट होते हैं. बाकी जीवन में अंग्रेजी या हिंग्लिश बोलते हुए ही गौरवान्वित महसूस करते हैं.
हिंदी सिनेमा जगत में ऎसे पुरोहितों की बहुतायत है. उदारीकरण के बाद जब फिल्में वैश्विक हुईं, तब तो फिल्मों की भाषा भी हिंग्लिश होने लगी, लेकिन उसके पहले भी हिंदी फिल्म जगत में अंग्रेजी और अंग्रेजी दाँ लोगों की पकड़ ज्यादा मजबूत थी. अंग्रेजी बोलना गौरव और प्रतिष्ठा की बात थी. इसलिए देख लीजिए, फिल्म के निर्माता संगठनों से लेकर हमारे लेखक संगठन का नाम भी अंग्रेजी में है “फिल्म रायटर्स एसोसिएशन”. उसका संविधान अंगेजी में है. उसके कामकाज की भाषा अंग्रेजी है. उनके पत्र व्यवहार अंग्रेजी में होते हैं. उनकी कार्यकारिणी समिति की सभाएँ अंग्रेजी या हिंग्लिश में होती है. सभाओं में किन विषयों पर चर्चा हुई और क्या निर्णय लिए गये, उसका अभिलेख भी अंग्रेजी में ही लिखा जाता है.      
मंचों पर बोलना होता है तो हम बड़े गर्व से कहते हैं कि अंगेजी और चीनी भाषा के बाद पूरी दुनिया में बोली और समझी जानेवाली तीसरी सबसे बड़ी भाषा हमारी हिंदी है. लेकिन सत्य यह है कि अच्छी हिंदी समझने, बोलने और लिखने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. अंग्रेजी शब्दों का चलन बढ़ता जा रहा है और हिंदी के ढेर सारे सामान्य शब्द भी प्रयोग से दूर होते जा रहे हैं. ऎसे में हिंदी को बचाने का प्रयास सिर्फ हमारे कर्तव्य बोध के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. हिंदी को सचमुच यदि अपनी अस्मिता और आत्म गौरव से जोड़े रखना है, तो हिंदी के लिए ईमानदारी से सोचना होगा और न सिर्फ सोचना होगा, हिंदी हमारी आवश्यकता की भाषा कैसे बने, इसपर गंभीर चिंतन, मनन और काम करने होंगे.
इसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि योग को 177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के लिए आजादी के 68 साल बाद भी हम 129 देशों का समर्थन नहीं जुटा पाए हैं.

धनजंय कुमार


       

Tuesday, 17 March 2015

किसानों के नाम पर झूठा विलाप


भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर देश में मचे शोरशराबे से लगता है कि किसानों को लेकर हमारे सारे राजनेता बहुत चिंतित हैं. विरोधी पक्ष के नेतागण उपवास रख रहे हैं, रैलियाँ कर रहे हैं और किसानों को गुस्से से भरा भाषण पिला रहे हैं, तो सत्ता पक्ष के नेता किसानों के हित में भूमि अधिग्रहण कानून के फायदे गिना रहे हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि राजनेता चाहे वह काँग्रेसी हों या भाजपाई या नीतीश कुमार, सब ढोंग कर रहे हैं. इनमें से किसी को भी किसानों के हित से कोई लेना-देना नहीं है. सब किसानों के नाम पर झूठा विलाप कर रहे हैं.

जिस भूमि अधिग्रहण कानून में किसानों के हक को और सुरक्षा देने के नाम पर विपक्ष में रहते हुए बीजेपी के नेतागण कल संसद से लेकर टीवी न्यूज चैनल पर काँग्रेस को घेर रहे थे, वही बीजेपी सत्ता में आने के बाद किसानों के सारे हक छीनने पर आमादा है. जो काँग्रेसी आज बीजेपी के भूमि अधिग्रहण कानून को किसान विरोधी बताकर हंगामा करते दिख रहे हैं, वे आजादी के 60 साल के बाद तक किसान विरोधी अंग्रेजी कानून का डंडा चला किसानों को धौंसियाते रहे. नीतीश कुमार, जो अपने आपको किसान के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में खुद को प्रकट कर रहे हैं, उनके प्रदेश बिहार में किसानों की कौन सी फजीहत नहीं है. रेवेन्यु कर्मचारी से लेकर सीओ - बीडीओ तक किसान के आका बने हैं. किसान के नाम पर तरह - तरह की सब्सिडियाँ बाँटी जा रही हैं, लेकिन इसका फायदा किसानों के बजाय अफसरों से लेकर मंत्रियों और कृषि क्षेत्र में व्यापार कर रहे उद्योगपतियों और उनके दलालों को मिल रहा है. किसानों के खलिहानों में धान रखे हैं और अफसर कह रहे हैं कि धान खरीद का कोटा पूरा हो गया है. नीतीश कुमार वाकई अगर किसानों के हित चाहते, तो क्या किसानों के धान बिकने से पहले ही कोटा पूरा हो जाता? ये कैसा कोटा है भाई? दरअसल, यह कोटेबाजी भी एक तरह का ढोंग है, जो किसानों के नाम पर वाहवाही भी लाकर देता है और व्यापारियों की भी चाँदी करता है. कोटा पूरा हो जाने की वजह से जो किसान धान नहीं बेच पाए, अब वह खुले बाजार के खरीदारों के पास जाएँगे, जहाँ उनको धान के न्यूनतम सरकारी मूल्य से पाँच सौ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से कम मूल्य पर धान बेचना होगा. इसके अलावा जिन किसानों को सरकारी खरीद में धान बेचने का सौभाग्य प्राप्त हो गया, उनको भी सौ से लेकर तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से घूस देने पड़े. तो यह है नीतीश कुमार जी की किसान चिंता की वास्तविकता.

बीजेपी की चिंता की बानगी मौजूदा वित्त मंत्री और देश के मानिंद वकील अरुण जेटली जी की दलील में देखिए. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाने के तुरंत बाद एक चैनल से बात करते हुए बता रहे थे कि अधिगृहीत जमीन का मुआवजा तो ज्यादा मिल ही रहा है, वहाँ उद्योगपतियों के उद्योग-धंधों के लगने की वजह से जो विकास होगा, उसकी वजह से किसानों की बची जमीन की कीमत भी कई गुणा बढ़ जाएगी. यानी कि किसानों की जमीन की कीमत बढ़ाकर जेटली साहब किसान को बचाना चाहते हैं. क्या यह संभव है ? जमीन की कीमत के बढ़ने से बेशक तात्कालिक तौर पर उस किसान को फायदा होता दिख रहा है, किंतु वास्तव में किसान और देश, दोनों के साथ यह बड़ा छल है. किसानों का वास्तविक फायदा तब होगा, जब खेतों में उत्पादित उसकी फसलों को बाजार से सही कीमत मिलेगी. तमाम तरह की अनिश्चितताओं, दुश्वारियों और फसल की लाभ सहित कीमत नहीं मिलने से परेशान किसान पहले ही खेती से पलायन कर रहा है, जब उसके खेतों को ज्यादा कीमत मिलेगी, तो जाहिर है किसान खेत बेच देगा. आँकड़े भी लगातार बता रहे हैं कि खेती की जमीन और किसान देश में लगातार कम हो रहे हैं. जबकि आबादी बढ़ती जा रही है. यानी खानेवाले बढ़ रहे हैं और खाद्य पदार्थ उपजाने वाले कम होते जा रहे हैं. मतलब, भविष्य में बीजेपी सरकार विदेशों से अनाज आदि मँगवाकर देश की खाद्य जरूरतें पूरी करना चाहती है. बीजेपी की कृषि नीति की कलई महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या के बाद उसके परिजनों को मिलने वाले सरकारी मुआवजे की रकम को एक लाख से बढ़ाकर पाँच लाख करने के विमर्श चिंतन से भी खुलती है. किसान के सामने आत्महत्या की स्थिति बने ही नहीं, इस दिशा में सार्थक कदम उठाने के बजाय मुआवजा बाँटकर दयालु और दानी होने का खिताब पाना ज्यादा जरूरी लगता है.

किसान हमारी प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. लेकिन आजादी के बाद देश के नीतिकारों ने अर्थव्यवस्था की जो राह चुनी, वह किसानों की रीढ़ तोड़नेवाली साबित हुई है. किसानी आज पूरी तरह घाटे का सौदा बनी है. किसान खेत छोड़कर भाग रहे हैं या आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन हमारी सरकारें इतरा रही हैं कि भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने के क्रम में है. यह ख्वाब हमें ग्लोबलाइजेशन के शुरू होने के साथ से ही दिखाया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि देश की आधी से अधिक आबादी अभी भी पेट भरने की चिंता से ग्रस्त है. सरकार गाँवों की 75 प्रतिशत आबादी और नगरों-महानगरों की 50 प्रतिशत आबादी को सस्ती कीमत पर पेट भरने भर अनाज बाँट रही है. बाकी आबादी में से अच्छी नौकरियाँ या व्यवसाय कर प्रति महीने लाख रुपए कमानेवाला मध्यवर्ग भी घर गाड़ी और बच्चों की पढ़ाई की चिंता में डूबा है. वह अपने लिए जरूरी सुविधाएँ जुटाने में त्रस्त और पस्त है. आर्थिक - सामाजिक विषमता लगातार बढ़ती जा रही है. कुछ धन्नासेठों को छोड़ दें, तो कोई सुकून का जीवन कोई भी नहीं जी पा रहा है. इसकी वजह है हमारी अर्थव्यवस्था.

हमारी प्राचीन अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी. अर्थव्यवस्था के केन्द्र में किसान था. वह खेतों से अनाज आदि उपजाता था और मजदूर से लेकर तमाम तरह के शिल्पकार-कलाकार उसके आश्रय में सुकून से पलते थे. बढ़ई, कुम्हार, लुहार, चर्मकार आदि खेती के सीजन में किसानों के लिए खेती की जरूरत की चीजें बनाते थे और बाकी समय में निश्चित होकर अपने शिल्प और कला को निखारते थे, क्योंकि सारी जरूरतें किसान पूरी करते थे. ब्राह्मण भी पूजा-पाठ से बचा समय अध्ययन-अध्यापन में लगाते थे. सुरक्षा का जिम्मा सम्भालने वाले सिपाही और राजा को भी किसान ही कर देता था. वह सह-अस्तित्व पर आधारित अर्थव्यवस्था थी. सबके मानवीय सरोकार एक दूसरे से जुड़े थे. जबकि देश की मौजूदा अर्थव्यवस्था सह-अस्तित्व के बजाय शोषण पर आधारित है. इसमें अधिकतम मुनाफा कमाने और पूँजी बढ़ाने की ललक ज्यादा है और मानवीय सरोकार न्यूनतम. यही कारण है कि जीवन के भौतिक ऎशो-आराम कुछ लोगों तक सिमट कर रह गए हैं.. अपने आपको आगे बढ़ाने और बनाए रखने के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा चल रही है. और दुखद यह है कि हमारे राजनेता इस गलाकाटू अर्थव्यवस्था को पोसने में जी जान से जुटे हैं. किसानों की कीमत पर उद्योगपतियों को आगे बढ़ा रहे हैं. इसमें उन्हें अपना तात्कालिक हित भी सधता दिखता है कि उद्योगपति उनका सारा खर्च उठा रहे हैं. चुनाव के समय मतदाता को लुभाने के लिए पार्टी को भारी भरकम चंदा देते हैं. किसान क्या देते हैं ?! इन्कमटैक्स भी नहीं देते! लेकिन उनका यह सोच देश को किस कंगाली की तरफ ले जा रहा है, इसका अभी अहसास तक शायद नहीं है. सब देशहित और गरीबों की बात कर देश को लूटने में मस्त हैं. चिंता गहरी है, मगर पत्रकारों को इस पर विमर्श की फुर्सत नहीं है. फिर देश को ढोंगी नेताओं से कौन बचाएगा?

धनंजय कुमार


धनंजय कुमार
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Saturday, 16 August 2014

प्रधानमंत्री गाँवों को कैसे बनाएँगे स्वावलंबी ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर दिए अपने पहले भाषण में गाँवों को लेकर जो दृष्टिकोण प्रकट किया है, वह गाँववासियों के लिए आह्लादकारी तो है ही, शहरों में रह रहे शहरियों के लिए भी सुखदायक है. क्योंकि अगर गाँव की दशा और दिशा बदलेगी, तो गाँवों से भारी संख्या में हो रहा पलायन काफी हद तक थमेगा. शहरों में भीड़ घटेगी और बढ़ती आबादी की वजह से चरमराती शहरी व्यवस्था कुछ बेहतर होगी.
भारत गाँवों का देश है, हमारी संस्कृति गाँवों से ही उपजी है और हमारे विचारों का मूल आधार भी गाँव है. हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इसे भली भाँति जानते थे, इसीलिए उन्होंने भारत की तरक्की का रास्ता भी गाँवों से निकलते हुए रास्तों में देखा था. मगर स्वतंत्रता के बाद हमारे देश के गाँधीवादी नेता उस राह पर चल न सके. देश की तरक्की का रास्ता उन्हें भारतीय गाँवों के बजाय यूरोपीय रास्तों पर चलने में दिखा. देश में शहरीकरण और औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया गया और विकास की दौड़ में गाँवों की भूमिका को गौण कर दिया गया.
खुशी है कि 67 साल बाद किसी प्रधानमंत्री ने हमारे गाँव की शक्ति को पहचाना. जिस तरह से महात्मा गाँधी पहचानते थे. हालाँकि हमारे नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस सांगठनिक पृष्ठभूमि से आएँ हैं, जिस पर महात्मा गाँधी की हत्या में शामिल रहने का आरोप है. खैर वो इतिहास और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीतिक बातें हैं, आज की सच्चाई यह है कि नरेन्द्र मोदी महात्मा गाँधी के सपनों को अपना सपना मानकर उसे पूरा करने का संकल्प करते दिख रहे हैं. उन्होंने अपने भाषण में महात्मा गाँधी की दृष्टि का विशेष तौर पर जिक्र किया है. यह सुखद है.
नरेन्द्र मोदी ने अपने सांसदों का आह्वान किया है कि सभी सांसद अपने-अपने क्षेत्र में आदर्श गाँव के निर्माण में जुट जाएँ. शहरी क्षेत्र के सांसदों से भी गाँव चुनने की अपील की है. ऎसी ही अपील मोहन दास करमचन्द गाँधी यानी हमारे महात्मा गाँधी ने आजादी की लड़ाई लड़ते वक्त काँग्रेसी कार्यकर्त्ताओं से की थी कि वे गाँवों से जुड़ें और उनकी बेहतरी के लिए काम करें. साफ –सफाई से लेकर किसानी और ग्रामीण व्यवस्था तक के सभी कामों से काँग्रेसी कार्यकर्त्ताओं से अपील की थी. लेकिन जब नेताओं ने ही गाँधी की अपील को नजरअंदाज कर दिया तब कार्यकर्ताओं से कौन पूछे.
आजादी के बाद नेताओं और मंत्रियों के फॉर्महाउस नुमा बड़े-बड़े बंगले इसलिए बनबाए गए थे कि सांसद-विधायक और मंत्री अपने रिहाइशी परिसर में खेती का कार्य भी करेंगे और किसानों की समस्या को नजदीक से समझेंगे. ज़रूरत भर अनाज उगा लेंगे यह उसका निहित ल्क्ष्य था.
मगर हुआ क्या? राष्ट्रपिता के विचारों की अवहेलना और देश के संसाधनों का फिजूल इस्तेमाल.
नरेन्द्र मोदी अगर अपने सांसदों को आदर्श गाँव बनाने के लिए मोटिवेट करने में कामयाब हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर बड़ी उपलब्धि होगी और देश को नई दिशा मिलेगी. देश उस रास्ते पर चल पड़ेगा जो उसका स्वाभाविक रास्ता है. यूरोपियन रास्ते पर चलकर हमने तरक्की तो की है, मगर अपनी जमीन, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान की अवहेलना कर, उसे जबरन त्याग कर. नरेन्द्र मोदी अगर हमारी राष्ट्रीय पहचान और शक्ति को सचमुच देश के विकास की मुख्यधारा बनाना चाहते हैं, तो यह गाँधी के सपनों का भारत बनाने की दिशा में ठोस कदम होगा.
लेकिन पिछले 67 सालों में देश ने अपनी व्यवस्थाएँ जिस तरह की बनाई हैं और अपने जनमानस को जिस तरह की मानसिकता दी है, उसे विपरीत दिशा में बदल पाना आसान नहीं है. भारत गाँवों का देश है. अभी भी 7 लाख से अधिक गाँव हैं जिसमें 70 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है. मगर पिछले 67 सालों में देश की अर्थ व्यवस्था पूरी तरह शहरोन्मुखी रही. इन सालों में गाँव न सिर्फ आर्थिक स्तर पर बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी बर्बाद हुए. आज गाँवों में न रोजगार है, न समाज और न ही चेतना. हर स्तर पर गाँव शहरों की नकल बन गए हैं.
इन सालों में गाँवों की मदद के नाम पर भारत व राज्य सरकारें हर साल बेशक लाखों, करोड़ों और अरबों रुपए खर्च करती रही, मगर गाँवों में न तो शिक्षा का स्तर सुधरा न जीवन स्तर. गाँवों का मुख्य रोजगार कृषि इन सालों में बुरी तरह चौपट हुआ, क्योंकि कृषि उत्पादनों को न्यायसंगत मुनाफा आधारित बाजार देने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुई. कृषि लगातार घाटे का रोजगार बनी रही. कृषि के जरूरी संसाधनों खाद, बीज, कृषि यंत्र की कीमतों और मजदूरी में निरंतर वृद्धि की वजह से किसानों का घाटा लगातार बढ़ता गया. ऊपर से मॉनसुन के भरोसे खेती. कभी बाढ़ तो कभी सूखे से सामना. किसानों को घोर निराशा में धकेल दिया. आज किसान खेती छोड़कर शहर की तरफ भाग रहे हैं. बच्चों को खेती से दूर रखने की हर संभव जुगत कर रहे हैं.

ऎसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुनौती है कृषि को लाभोन्मुखी बनाना. यह बेहद कठिन काम है, क्योंकि कृषि उत्पादित वस्तुओं के न्यायसंगत मूल्य निर्धारण से खाद्य वस्तुओं की कीमते बढ़ेंगी और महँगाई दमघोंटू स्तर पर पहुँच जाएगी. देखना है कि नरेन्द्र मोदी स्वतंत्रता के बाद शहरजीवी बन गए गाँवों को कैसे स्वावलंबी बनाते हैं ?
धनंजय कुमार 

Sunday, 29 June 2014

गाँव को बचाना है तो भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करना होगा

हमारे गाँव और भूमि अधिग्रहण कानून
भूमि अधिग्रहण कानून आरंभ से ही हमारे गाँव के लिए अभिशाप की तरह रहा. देश में पहली बार भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में बना. अंग्रेजी सरकार ने सार्वजनिक तरक्की के उद्देश्य की पूर्त्ति के लिए यह कानून बनाया था. हालाँकि कोई भी कानून न्याय को आधार बनाकर ही बनाया जाता है, मगर अंग्रेजों द्वारा बनाया गया यह भूमि अधिग्रहण कानून सीधे तौर पर न्याय को अँगूठा दिखानेवाला था. यह कानून सरकार को भूमि अधिग्रहण का अधिकार तो देता था, मगर जिसकी जमीन का अधिग्रहण किया जाता था, उसकी न तो मर्जी की परवाह थी, न उसके नुकसान और भविष्य की. कोई भी सरकार शासन के एवज में सुरक्षा के जो अधिकार देने को बाध्य होती है, इस कानून के तहत उस सुरक्षा के अधिकार की भी धज्जियाँ उड़ाई जाती रहीं. आश्चर्यजनक और विडंबनापूर्ण तो यह है कि आजादी के बाद भी यह कानून दशकों हमारे किसानों का गला घोंटता रहा. आजाद हिन्दुस्तान में भी किसी ने किसानों के साथ होनेवाले इस अन्याय की तरफ ध्यान नहीं दिया.
अंग्रेजों द्वारा बनाये गये इस भूमि अधिग्रहण कानून को न्यायपरक बनाने का प्रयास पहली बार आजादी के 37 सालों बाद 1984 में किया गया. इस बदलाव में किसानों को उचित मुआवजा देने का प्रावधान किया गया. मगर अंग्रेजों का बनाया यह कानून वैसे ही अलोकतांत्रिक बना रहा, यानी सरकार सार्वजनिक हित के उद्देश्य से किसानों की मर्जी के बगैर भी भूमि अधिग्रहण कर सकती थी. वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद इस कानून का और भी बेजा इस्तेमाल हुआ. नेताओं, नौकरशाहों और पूँजीपतियों के सिंडिकेट ने इस कानून की आड़ में खूब पैसे बनाये. उद्योग लगाने और घर मुहैया कराने के नाम पर उद्योगपतियों और बिल्डरों को सस्ती कीमतों पर जितनी चाहिए, उतनी जमीनें दी गईं, जिसे बाद में उनलोगों ने ऊँची कीमतों पर बेचा और करोड़ों-अरबों कमाए. और वे किसान, जिनकी जमीनें अधिग्रहण कानून के तहत ली गईं, ठगे गए. किसानों को जब इस बात का अहसास हुआ, तब आन्दोलन हुए और मामला कोर्ट तक पहुँचा. कोर्ट ने किसानों का पक्ष सुनने के बाद कई अधिग्रहणों को अवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने तो इस कानून को सरासर धोखा बता इसे खत्म कर दिये जाने तक की बात कह डाली. तब जाकर देश के नीति-नियंताओं की चेतना और गैरत जागी और नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाने की कवायद शुरू हुई. और 29 अगस्त 2013 को भूमि अधिग्रहण कानून उचित मुआवजा और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक 2012” नाम से पास किया गया.
देश में तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की खातिर भूमि अधिग्रहण आवश्यक तो है, मगर जिस अदूरदर्शी तरीके से भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, वह भारतवर्ष के भविष्य के लिए न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि भारत की पहचान को लेकर भी गंभीर चिंता प्रकट करता है. भूमि अधिग्रहण करते वक्त भारत के नीति नियंताओं को यह सतत याद रखने की ज़रूरत है कि भारत की पहचान आरंभकाल से कृषि प्रधान और गाँवों के देश के रूप में रहा है. इसके रहन-सहन, खान-पान, पारिवारिक-सामाजिक रीति-रिवाजों और उत्सवों-त्योहारों में भी ग्रामीण जीवन की गहरी छाप है. इसीलिए हमारे देश के मनीषियों-चिंतकों ने बार-बार यह माना और दोहराया है कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है. नये उद्योग-धंधे लगाने और नये शहर बसाने के जुनून में आवश्यक भूमि का अधिग्रहण करते वक्त यह ध्यान रखना होगा कि ज़रूरी विकास तो हो, मगर हमारी प्राचीन पहचान और संस्कृतियों को भी नुकसान न पहुँचे. 29 अगस्त 2013 को पास हुआ नया भूमि अधिग्रहण कानून पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के अन्यायपूर्ण प्रावधानों को खत्म कर प्रभावितों के अधिकारों को अधिक से अधिक सुरक्षा प्रदान तो करता है, किंतु ‘हमारे गाँव’ और ‘खेती’ के अस्तित्व पर मंडराते संकट को यह तनिक भी कम नहीं करता है.
खेती ही हमारे भोजन का आधार हैं, ऎसे में यह बेहद आवश्यक है कि खेती योग्य जमीनों की हर हाल में रक्षा की जाय, मगर दुर्भाग्य यह है लगातार बढ़ते शहरीकरण की वजह से खेती योग्य जमीनें लगातार विकास की भेंट चढ़ती जा रही हैं, जबकि देश-दुनिया की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है. हरित क्रांति ने बेशक खाद्य पदार्थों के उत्पादन में बढ़ोतरी की है, मगर अन्न, सब्जी, फल और दूध आदि पौष्टिक खाद्य ज़रूरतें अब भी आधुनिक समाज के समाज के सामने मुँह फैलाए खड़ी है. विज्ञान के दम पर पेट भरने भर अनाज उपजाने में हम कामयाब ज़रूर रहे हैं, मगर हर नागरिक को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में हम अब भी नाकामयाब रहे हैं. चिंताजनक बात यह है कि 2013 में बना भूमि अधिग्रहण कानून भी भविष्य में और गहराते भोजन के इस देशव्यापी संकट को पहचानने में नाकामयाब रहा है.
आरंभिक काल से लेकर अंग्रेजों के शासन के पूर्व तक भूमि को सम्पत्ति के तौर पर नहीं, जीवन जीने के आधार के तौर देखा-समझा जाता था, मगर अंग्रेजों ने प्रॉपर्टी के तौर पर देखने की हमें दृष्टि दे दी. आजादी के बाद प्रबुद्ध भारतवासियों को इस दृष्टि में तरक्की की अपार संभावनाएँ दिखी, लिहाजा न तो ज़रूरी भूमि सुधार ही लागू हो पाये और न ही भूमिका वास्तविक मोल ही समझा गया. भूमि का असली मूल्य है उसकी उर्वरा में, अन्न, सब्जियां, फल आदि के ज़रूरी खाद्य पदार्थों के उत्पादन में, मगर आधुनिक भारत ने इसकी उर्वरा के बजाय इसके बांझपन को ज्यादा कीमती माना. फसलों से लहलहाते खेतों से ज्यादा कीमती कंक्रीट के जंगल हो गये.
नया भूमि अधिग्रहण कानून खेती की जमीन को कंक्रीट के जंगल में तब्दील करने के लिए पुरजोर तरीके से उत्साहित करता है. सरकारें जिस भी क्षेत्र की जमीनों का सरकारी या निजी उपक्रमों के लिए भूमि का अधिग्रहण करती हैं, वहाँ की जमीनों के भाव आसमान छूने लगते हैं. भूमि अधिग्रहण कानून में सरकार ने यह व्यवस्था दी है अधिग्रहण असिंचित, बंजर और खेती के लिए अयोग्य भूमि का ही अधिग्रहण किया जाएगा, और अगर इस तरह की भूमि उपलब्ध न हो, तो खेती योग्य भूमि का भी अधिग्रहण किया जा सकता है. इसमें पहली बात तो यह है कि कोई भूभाग अगर आजादी के इतने साल बाद भी, असिंचित है और उसकी वजह से बंजर और अनुपजाऊ है तो इसकी वजह भूमि नहीं हमारी सरकारों का नकारापन है कि हमारी सरकारें उचित जलप्रबंधन करने में अबतक असफल रही है. दूसरी बात यह कि बंजर होने की वजह से जो भूमि बेकार पड़ी थी, जिसकी कोई उल्लेखनीय कीमत नहीं थी, वह जमीन खेतीयोग्य जमीनों से भी ज्यादा कीमती हो गई. बंजर जमीनों के मालिक अमीर हो गये और कृषियोग्य जमीनों वाले किसान गरीबी की वजह से आत्महत्या करने को अभिशप्त.
भूमि अधिग्रहण कानून की दूसरी बड़ी विडम्बना या खामी कहें वह यह है कि कृषि भूमि का अधिग्रहण कर उद्योगों के साथ-साथ रियल-एस्टेट को भी पूरे जोर-शोर से बढ़ावा दिया जा रहा है। रियल एस्टेट आज भारतवर्ष का सबसे कमाऊ क्षेत्र है. कमाई कितनी है इसका अन्दाजा इसी से लगा लीजिए कि जमीनों की दलाली करनेवाले लोग भी लाखों-करोड़ों कमा रहे हैं. देश के काले धन का बहुत बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट में लगा है. भूमि मालिकों के पुनर्वास को लेकर सरकार नगद मुआवजा देकर उन्हें चुप तो करा देती है, मगर इस बिजनेस के खेल में कृषिभूमि और किसान उजड़ रहे हैं. इसकी चिंता भूमि अधिग्रहण कानून में दिखाई नहीं पड़ती.
आखिर आदर्श भूमि अधिग्रहण कानून का आधार क्या होइस कानून में ऐसी कौन-कौन सी शर्तें जोड़ी जाय कि किसानों के हितों को भी चोट  पहुंचे और सार्वजनिक विकास में भी बाधा  आए?
इसके लिए ज़रूरी है कि अधिग्रहण कानून में गाँव और खेत को बचाए रखने की शर्त्त अनिवार्य की जाय. इस संबंध में कोई निश्चित नियम न होने की वजह से तेजी से शहरीकरण होते इस दौर में नई इंडस्ट्री के लगते ही नई रिहाइशी कॉलोनियाँ बननी शुरू हो जाती है, और खेती योग्य पूरी की पूरी ज़मीन भी ऊँची कीमतों पर बिल्डरों द्वारा खरीद ली जाती है. इससे खेती की ज़मीन तो खत्म होती ही है, गाँव का अस्तित्व भी सदा के लिए नष्ट हो जाता है. इसके लिए आवश्यक है कि अधिग्रहण कानून में कुछ ज़रूरी बातें शामिल कर ली जायं.
पहली शर्त्त, तो यह हो कि एक खास प्रतिशत से अधिक ज़मीन एक साथ अधिग्रहित नहीं की जाय, दूसरी शर्त्त, यह जोड़ी जाय कि किसानों को खेती की जमीन के एवज में नगद मुआवजा देने के बजाय वहीं आसपास खेती योग्य ज़मीन ही दी जाएगी, ताकि खेत और किसान दोनों बचे रहे, तीसरी शर्त्त यह हो कि खेती योग्य ज़मीन का वह खास प्रतिशत जो खेती के लिए संरक्षित है, उसका इस्तेमाल सिर्फ खेती के लिए हो. और चौथी शर्त्त यह हो कि नई कॉलोनियाँ बसाने हेतु ज़मीन अधिग्रहण के साथ यह निश्चित किया जाय कि इतने फ्लैट्स के बाद इतनी खेती योग्य ज़मीन होना अनिवार्य है. इससे दो तरह के लाभ होंगे, एक तो, खेत, किसान और गाँव का अस्तित्व बचा रहेगा, दूसरे, कॉलोनियों में बसे गैर कृषक आबादी को ज़रूरी खाद्यान्न पास के किसानों से उपलब्ध हो जाया करेगा. इससे किसानों को पास में ही बाज़ार मिल जाएगा और शहरी आबादी को अपेक्षाकृत सस्ते और बढ़िया खाद्यान्न मिल जाया करेंगे.
बहरहाल, यदि भारत वर्ष की वास्तविक पहचान को बचाए रखना है तो भूमि अधिग्रहण कानून में गाँव और किसान के अस्तित्व को बचाने हेतु संशोधन ज़रूरी है.